दिव्यांगों के न्याय, हक और सम्मान की लड़ाई लड़ते रहे हैं वीरेन्द्र कुमार
1986 से शुरू हुआ सेवा का सफर, आमरण अनशन से लेकर कानपुर-लखनऊ पदयात्रा तक संघर्ष की लंबी दास्तान
फाइटर जी कहींन संवाददाता
कानपुर नगर। बर्रा-8 निवासी वरिष्ठ समाजसेवी वीरेन्द्र कुमार पिछले करीब चार दशक से दिव्यांगजनों के अधिकार, न्याय और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वर्ष 1986 में अपने एक दिव्यांग मित्र के साथ शुरू हुआ उनका सेवा सफर आज भी जारी है। दिव्यांगों के बीच उन्हें उनके संघर्ष और सक्रियता के चलते मसीहा के रूप में जाना जाता है।
वीरेन्द्र कुमार का कहना है कि दिव्यांगजनों को समाज में बराबरी का अधिकार, सम्मान और सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ मिलना चाहिए। इसी उद्देश्य को लेकर उन्होंने कई आंदोलनों और धरना-प्रदर्शनों में भाग लिया तथा कई बार अनशन किया।
आठ बार आमरण अनशन, 14 बार अनशन

दिव्यांगों के अधिकारों के लिए वीरेन्द्र कुमार अब तक आठ बार आमरण अनशन और कुल 14 बार अनशन कर चुके हैं। उनके अनुसार कानपुर के फूलबाग स्थित गांधी प्रतिमा पर किया गया 14 दिन का अनशन उनके सबसे लंबे आंदोलनों में शामिल रहा। उनका दावा है कि उस दौरान पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर भोर करीब तीन बजे केपीएम अस्पताल में भर्ती कराया और अनशन समाप्त कराया। गिरफ्तारी के विरोध में दिव्यांगजनों ने फूलबाग चौराहे पर जाम लगा दिया था। बाद में उन्हें जेल गेट से वापस कचहरी लाया गया और मांगों पर सहमति बनने के बाद रिहा किया गया।
उन्होंने अन्ना हजारे के आह्वान पर नौ दिन का अनशन भी किया था।
आठ बार कानपुर से लखनऊ तक पदयात्रा

दिव्यांगों की समस्याओं को शासन तक पहुंचाने के लिए वीरेन्द्र कुमार ने दिव्यांगजनों के साथ कानपुर से लखनऊ तक आठ बार पदयात्रा की। उनके मुताबिक चार बार प्रशासन ने उन्हें लखनऊ जाने से रोक दिया। एक अवसर पर कानपुर और उन्नाव प्रशासन द्वारा पदयात्रा रोके जाने तथा दिव्यांग साथी चन्द्रशेखर सक्सेना के खिलाफ दर्ज कथित बिजली चोरी के मुकदमे को लेकर भी उन्होंने आंदोलन किया और उनकी रिहाई की मांग उठाई।
दिल्ली के जंतर-मंतर तक पहुंची आवाज

दिव्यांग अधिकारों से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए वीरेन्द्र कुमार करीब दस बार दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन कर चुके हैं। इनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद से जुड़े एनजीओ के ट्राईसाइकिल एवं बैसाखी वितरण में कथित अनियमितताओं के खिलाफ किया गया आंदोलन भी शामिल रहा। वीरेन्द्र कुमार के अनुसार, उनके संगठन के दबाव के बाद एनजीओ से जुड़ी लुईस खुर्शीद के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हुई थी।
उनके मुताबिक इस आंदोलन में अरविंद केजरीवाल भी दिल्ली में शामिल हुए थे और फर्रुखाबाद में सलमान खुर्शीद के खिलाफ आयोजित रैली में भी उन्होंने भाग लिया। बाद में उनके संगठन और केजरीवाल के बीच राजनीतिक मतभेद हुए और राष्ट्रीय विकलांग पार्टी ने उनसे दूरी बना ली।
एक दिन में दर्ज हुईं 12 एफआईआर
वीरेन्द्र कुमार के संघर्ष की एक और घटना कानपुर के शिक्षक पार्क में हुए धरना-प्रदर्शन और अनशन से जुड़ी है। उनका दावा है कि उस आंदोलन के दौरान एक ही दिन में दिव्यांग उत्पीड़न से संबंधित 12 एफआईआर दर्ज हुईं और संबंधित मामलों को संबंधित थानों में स्थानांतरित कराया गया।
आज भी जारी है संघर्ष

करीब चार दशक के संघर्ष के बाद भी वीरेन्द्र कुमार का अभियान रुका नहीं है। उनका कहना है कि दिव्यांगजनों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का कोटा बढ़ाने और उसे पूरी तरह लागू कराने, पेंशन बढ़ाने, रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने तथा दिव्यांगजनों के साथ होने वाले अन्याय और अत्याचार के खिलाफ कार्रवाई कराने की लड़ाई लगातार जारी है।
वीरेन्द्र कुमार का मानना है कि दिव्यांगजन किसी की दया के पात्र नहीं, बल्कि समान अधिकार और सम्मान के हकदार हैं। इसी विचार को लेकर वह वर्ष 1986 से लगातार संघर्षरत हैं। उनका जीवन दिव्यांग अधिकारों की लड़ाई और सामाजिक सेवा को सhदिव्यांगजनों के अधिकारों को लेकर पुलिस अधिकारियों से बातचीत करते वीरेन्द्र कुमार।मर्पित रहा है












