ठाकुर दलीप सिंघ जी
आज देश में एक अजीब विडंबना देखने को मिलती है, जिस तरफ बहुत कम लोगों का ध्यान जाता है। बच्चों का भविष्य बनाने वाले शिक्षकों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष निर्धारित है। देश की व्यवस्था एवं राजतंत्र को चलाने वाले आई.ए.एस., आई.पी.एस., आई.एफ.एस., आई.आर.एस. और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों को भी 58 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त कर दिया जाता है। जब कि देश चलाने वाले इन अधिकारियों को आदेश देने वाले अधिकांश मंत्री, बनते ही 58 वर्ष की आयु के उपरांत हैं। कितनी विडंबना है कि देश का राजनीतिक नेतृत्व करने वालों के लिए सेवानिवृत्ति की कोई आयु-सीमा निर्धारित नहीं है और न ही यह प्रश्न कभी गंभीरता से उठाया जाता है कि किस आयु के उपरांत उन्हें भी सेवानिवृत्त कर देना चाहिए। ऐसा क्यों?
गुरुवाणी में लिखा है “सतरि का मतिहीणु असीहां का विउहारु न पावै” (म. १)। गुरुवाणी अनुसार तो सत्तर वर्ष का वृद्ध ‘मतिहीन’ हो जाता है और अस्सी वर्ष की आयु में व्यवहार करना नहीं आता। “बालक बिरधि न सुरति परानि” (म. १)। बाल्य एवं वृद्ध अवस्था में तो चेतना ही नहीं रहती। परंतु हमारे नेता, वृद्धावस्था में ही स्वयं को ‘वास्तविक विद्वान’ मानते हैं। बड़ी पदवियों पर बैठे होने के कारण यह बुजुर्ग नेता, विदेशों में जा कर सरकारी खर्च पर इलाज कराने का लाभ भी लेते हैं। ऐसे लाभ लेने के लिए यह वृद्ध नेता, अपनी पदवी भी नहीं छोड़ते तथा युवाओं को भी आगे नहीं आने देते। यहाँ तक कि अपने बच्चों को भी अपनी पदवी नहीं लेने देते। केवल भारत में ही नहीं, पूरे विश्व के नेताओं का ऐसा ही हाल है। आप किसी भी देश के नेताओं के बारे में पढ़ कर देख लीजिए। वहाँ चाहे कोई राजा हो, या चुनाव प्रणाली से बना हुआ नेता; बढ़ती आयु के कारण कोई भी नेता, अपनी गद्दी छोड़ने को तैयार नहीं होता। प्रत्येक की मानसिकता ऐसी ही होती है कि मैं शासन करते हुए, नेतागिरी करते हुए ही मरूँ। यदि और कुछ नहीं तो मेरी बड़ी-बड़ी यादगारें तो बन ही जाएँगी। परंतु यही राजा और नेता; शिक्षकों तथा अन्य अधिकारियों की आयु सीमा निर्धारित कर के, उन्हें 60 वर्ष की आयु तक ही सेवानिवृत्त कर देते हैं; क्योंकि नियम बनाने की शक्ति इन्हीं बुजुर्ग नेताओं के हाथ में होती है।
विचार कीजिए! क्या यह 70–80 वर्ष के बुजुर्ग नेता; युवाओं की तुलना में देश को बेहतर चला सकते हैं? क्या केवल वृद्धावस्था ही अच्छे नेतृत्व की गारंटी है? यदि बूढ़े हो कर ही देश चलाने की, देश का भविष्य बेहतर बनाने की समझ आती है; तो फिर यही तर्क शिक्षकों एवं प्रशासनिक अधिकारियों पर भी लागू होना चाहिए। शिक्षकों की सेवानिवृत्ति आयु 80 वर्ष कर दी जाए, क्योंकि वह देश के बच्चों के भविष्य को गढ़ते हैं। प्रशासनिक अधिकारियों को भी निर्धारित आयु पर सेवानिवृत्त न किया जाए, क्योंकि उन का अनुभव देश के काम आ सकता है।
सोचने वाली बात है कि यदि 60 वर्ष का व्यक्ति; मंत्री बन कर लाखों-करोड़ों लोगों का भविष्य निर्धारित कर सकता है, तो फिर 60 वर्ष का शिक्षक या प्रशासनिक अधिकारी अपने अनुभव के बावजूद अचानक अयोग्य कैसे हो जाता है? वास्तविकता तो यह है कि देश की प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने का कार्य आई.ए.एस., आई.पी.एस., आई.एफ.एस., आई.आर.एस. और अन्य सिविल सेवाओं के अधिकारी ही करते हैं। विधायक, सांसद और मंत्री तो आम तौर पर केवल नेतागिरी ही करते हैं। अधिकतर को तो राज्य-प्रबंधन की जानकारी भी नहीं होती। वह अधिकारियों की सलाह पर ही निर्भर रहते हैं।
बड़े आश्चर्य की बात है कि जिन अधिकारियों ने 35–40 वर्षों का मूल्यवान अनुभव प्राप्त किया होता है, उन्हें 58 या 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त कर दिया जाता है। परंतु उन्हें आदेश देने वाले मंत्री, अक्सर इसी आयु के उपरांत मंत्री बनते हैं। यदि आयु बढ़ने के साथ ही समझ एवं योग्यता बढ़ती है, तो फिर सब से अधिक अनुभवी अधिकारियों को सेवानिवृत्त करना कितना तर्कसंगत है? क्या देश में आयु, अनुभव तथा योग्यता के मापदंड सभी क्षेत्रों के लिए एक समान होने चाहिए या अलग-अलग? जब आयु के प्रभाव से कोई भी नहीं बच सकता, तो फिर राजनीति के लिए अलग तथा शिक्षा एवं प्रशासन के लिए अलग मापदंड क्यों?
उपरोक्त प्रश्न का उत्तर भले ही अलग-अलग हो सकता है, परंतु इस पर गंभीर, निष्पक्ष तथा राष्ट्रीय स्तर की चर्चा अवश्य होनी चाहिए। यह किसी व्यक्ति या किसी राजनीतिक दल का प्रश्न नहीं है। यह एक सिद्धांत का प्रश्न है। देश में आयु, अनुभव तथा योग्यता के मापदंड; नेताओं सहित सभी के लिए एक-समान होने चाहिए। यदि सेवानिवृत्ति की आयु आवश्यक है, तो उस का मापदंड हर क्षेत्र पर एक जैसा लागू होना चाहिए। केवल कुछ वर्गों के लिए ही आयु की पाबंदी क्यों?
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